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Experiencing Life Raw

Experiencing Life Raw Distracting the mind from a main thing will never let you experience  that particular feeling, hence no awareness and it will lead to a veil of ignorance.  This is, I guess the root of suffering. We drift away from inconvenience and try  to focus on things which keep us distracted from the main course. We engage  ourselves in hobbies, work and possibly whatever other than that moment. It might ease you but it'll stop you to experience the moment and hence its learnings  goes into vain. If you are able to bear that then, my friend, you have done the great work. You learn when you are exposed to a particular moment and I'm having this idea when  I'm distracting myself too, from that particular idea, that little inconvenience which  itself hides a bliss. But now, I'm aware of the insight, so let's just be in that moment of  inconvenience, let's just feel that a bit, joy will come. Ashish Thakur Saad 

विकास : एक मानवीय दृष्टिकोण

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  मैं आसपास एक कमी अनुभव करता हूं, एक बेहद बुनियादी कमी। हम विकास में बेहद पीछे छूट चुके हैं, विकास से तात्पर्य बुद्धि के विकास से है। हम बेहद मतलब पर्सत लोग हैं, हम कहने को देशभक्त हैं, मग़र बस युद्ध के समय। हम हर दिन हर समय अपने देश से और अपने आप से गद्दारी कर रहे होते हैं। हम में ना तो ग़लत के ख़िलाफ़ बोलने की ताक़त है और ना ही नीयत।माना हम विकास कर रहे हैं, मग़र विकास बस संख्याओं के मायनों पर खरा उतरता है। शहीद ए आज़म भगत सिंह का एक विचार है के 'अंग्रेज़ चले जाएंगे मग़र भारतीय तब भी ग़ुलाम रहेगा', ग़ुलाम किसका, पूंजीपतियों का, जमींदारों का और इस दम घुटते प्रशासन का। लोग कहते हैं कि हमने काफ़ी विकास किया है, हां किया है, मग़र दुःख और खेद  ये है कि आपकी तुलना की पृष्ठभूमि वही रहती है, जब हम कहने को आज़ाद हुए थे। मैं एक तर्क यह भी रखता हूं और मानता भी हूं के ये प्रकृति ख़ुद ही में बराबरी को नहीं मानती। जिसके पास शक्ति है वो उसका प्रदर्शन करता ही है, मग़र प्रकृति सभी को एक सामंजस्य प्रदान करती है, सभी एक दूसरे पे आश्रित होते हैं। अब हम भी इसी प्रकृति का एक भाग हैं, सबसे विकसित भ...

सुलह-आशीष ठाकुर साद

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  सुलह   अब आलम यूं है के आदत पक चुकी है,और ये होता ही है के एक आदत के लगने से एक आदत छूटना भी शुरू हो जाती है या कहें अहमियत कम होना शुरू हो जाती है। ये बड़ा अजीब सा मकाम ज़िन्दगी में आया है,के मन डोल रहा है दो बेहद अज़ीज़ चीज़ों के बीच,और ऐसा भी नहीं है के मैं किसी एक को पकड़ना चाहता हूं और किसी एक को छोड़ना।बस बात ये है के एक प्यारा सा सम्बन्ध दोनों के बीच बना पाऊं।ऐसा इसलिए क्योंकि दोनों एक दूसरे के समान रूपी हैं, जैसे साइंस में कहते हैं "डायरेक्टली प्रपोशनल टू इच अदर" ,एक का विकास दूसरे से परस्पर जुड़ा है। अब शेर-ओ-शायरी कहने में,कविता लिखने में, ऐसा आनंद आता है के मानो यही करने को पैदा हुआ हूं। लिखना ही नहीं,कला का हर रूप मुझे लुभाता है,गीत, संगीत, चित्रकारी,कला के सारे आयाम मानो अपने से जोड़ना चाहते हों।                                      जब भी पढ़ने के लिए मेज़ पर बैठता हूं, हां,यही है दूसरी आदत जो मेरे बेहद क़रीब है, इतनी के जितना ज़रूरी सां...

~लब से लब~

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मैं लब से लब उस दफे मिलाऊंगा, तेरे दिल को जब तेरे लबों पे पाऊंगा।  हाथों को छूना गले लगाना सब ठीक है, छूऊँगा तब,बिन छूए जब बदन में सनसनी फैलाऊंगा। देखा जी मचलते हुए दिल दिमाग़ उलझते हुए, समझा ले ख़ुद को,नासमझी करके उलझन ना बढ़ाऊंगा। चाहना है गर मुझको और बस चाहते रहना है, यूं हो जाए तो आऊंगा वरना चला जाऊंगा। मोहब्बत करनी चाहिए हर दफे पहले पहल सी, शिद्दत वही टूटे तो दर्द वही,आदतन संभल तो जाऊंगा। माना उलझन है माना कोई दबी क़सक है, बैठूंगा,सुनूंगा,साद के वास्ते सब सुलझाऊंगा। आशीष ठाकुर साद 

~हवालातें~

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 क्या लिखेगा यार तू फ़िराक की बातें,  फिर तुझे याद आयेंगी कुर्बत की रातें. फिर तू बात अश्क और शराब की करेगा, बैचेन तुझे करेंगी उस संग की मुलाकातें. राहत तुझे रास नहीं,चैन पसंद नहीं, सुबह,शाम,शायरी में उसी की बातें. अब्र बरसने को है खिड़की बंद कर, अब ना रास आयेंगी तुझे ये बरसातें. तू वक्त पे क्या तोहमत लगाता है, कुर्बत मिली तो खुशी फुर्कत पे सवालातें. जिंदगी 'साद' से भर पछतावों से नहीं, अब यादों को उसकी मंजूर कर हवालातें. -आशीष ठाकुर साद 

~साद के साज़~आशीष ठाकुर साद

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  साज़ के ज़रिए बाहर निकलें मेरे राज़, लफ्ज़ों को पिरोना गुनगुनाना मेरा कामकाज़। अगर निभा रहा हूं रिश्ते-नाते तो क्या परेशानी, थोड़ा वक्त कर लूं इस पर बर्बाद,बोलो है कोई एतराज़। जानते हो तुम सबकुछ मगर कभी समझते नहीं, सुनो दिल की आवाज़, करो ज़िंदगी जीने का आगाज़। -आशीष ठाकुर साद 

~आहिस्ता~

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मुझसे ना उम्मीद कीजिए एक ख़त में इजहार की, मुझे शौक है थोड़े थोड़े करके प्यार के इकरार की. क्या मज़ा अगर एक ही दिन में सब हासिल हो जाए, यूं हो के थोड़ी मौज इस वार की थोड़ी अगले वार की. यूं तो है नहीं के बस मोहब्बत ही एक काम है, और यूं भी नहीं के आस ना रहे यार के दीदार की. 'साद' के वास्ते भटकना फिजूल का काम है, 'साद' तो हर उस जगह है जहां बात हो प्यार की. - आशीष ठाकुर साद वार = दिन

~ तल्खियां ~ आशीष ठाकर साद

  अब तेरा मेरा उम्र भर का ये फसाना, दूर दूर से तकना है पास पास नहीं आना है. अब जब दिल लगाया है दूसरे संग तो लगे रहने देना है, पहला प्यार समझ कर पिघलना नहीं दूसरा प्यार निभाना है. ये बात तल्खी की नहीं ये बात है वफाई की, नजरों के मिलने से बेहतर अब नजरों से उतर जाना है. -आशीष ठाकुर साद  song by- Piyush Mishra (used for fair use only)

~हाय कितनी मुश्किल है~आशीष ठाकुर साद

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  किसी पर मेरा दिल है,किसी का मुझ पर दिल है, किस ओर दिल लगाया जाए,हाय कितनी मुश्किल है. एक कहे तू ज़रा रुक,एक कहे बस थोड़ा और रुक, इंतजार करूं या जां-निसार करूं,हाय कितनी मुश्किल है. अकेले रह जाने में कितना सुकून मिल सकता है, मगर अकेले किसी को छोड़ें कैसे,हाय कितनी मुश्किल है. एक उम्र के दो इंसान,एक टूटा हुआ एक नादान, किसे थामू किसे वक्त के आसरे छोडूं,हाय कितनी मुश्किल है. - आशीष ठाकुर साद

~बेतरतीब~आशीष ठाकुर साद

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  अब कहां से शुरुवात की जाए गुजरे जमाने की,  कुछ भूल गया हूं कुछ बात है नहीं बताने की. किसने दिल तोड़े किसने क्या किया,ये बातें कभी और, अभी मेरे आगोश से लग कर बातें करो दिल लगाने की. मेरा कल गुजर चुका है,जो था जा चुका है,मैं अब यहीं हूं, तुम भी यहीं हो या आवाज़ आई तो तैयारी लौट जाने की. कल से कल को आज के हवाले कीजिए जानम, आओ इस आज मैं हम तुम शुरुवात करें नए जमाने की. -आशीष ठाकुर साद